मेजर सोमनाथ शर्मा – परमवीर चक्र के प्रथम प्राप्तकर्ता

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मेजर सोमनाथ शर्मा - परमवीर चक्र के प्रथम प्राप्तकर्ता.

“ दुश्मन हम से केवल 50 गज की दूरी पर है | उनके मुकाबले हमारी संख्या बहुत कम है बहुत ज्यादा गोलीबारी के बीच फंसे हुए हैं, मै फिर भी पीछे नहीं हटूंगा बल्कि लड़ाई करूंगा जब तक हमारा आखिरी जवान जिंदा है और हमारे पास आखरी गोली है” |

नाम:  मेजर सोमनाथ शर्मा।

जन्म : 31 जनवरी 1923

दाढ़, कांगड़ा, पंजाब प्रोविंस

आज का हिमाचल प्रदेश |

शहीद : 3 नवंबर 1947( उम्र। 24)

पुरस्कार: परमवीर चक्र (मृत्यु उपरांत)

पुरस्कार का वर्ष : 1950( गणतंत्र दिवस )

प्रारंभिक जीवन -:

Major Somnath Sharma

मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 में छोटे से गांव दाढ़ में हुआ था जो कि और आज के हिमाचल प्रदेश में आता है | वह एक मिलिट्री परिवार से आते थे| उनके पिता का नाम अमरनाथ शर्मा था जो कि एक मिलिट्री ऑफिसर थे। उनके भाई एवं बहन दोनों ही मिलिट्री में थे। एक मिलिट्री डॉक्टर थी।

मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज,नैनीताल से प्रारंभ की। इसके बाद उनका दाखिला प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री। कॉलेज, देहरादून में कर दिया गया। इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट में पूरी की।

सैन्य वृत्ति -:

मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज नैनीताल से प्रारंभ की। इसके बाद उनका दाखिला प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री। कॉलेज, देहरादून में कर दिया गया। इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने रॉयल मिलिट्री कॉलेज स सैंडविच। में पूरी की।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा ने के.एस थिमैया के अंदर जो कि आगे चलकर सीना प्रमुख बने ,बर्मा में ब्रिटिश सेना की तरफ से लड़ाई लड़ी। उनकी सबसे पहली पोस्ट। अराकान में हुई जहां उन्होंने अपने शौर्य का परिचय दिया। अराकान में बा जापानीस सेना के खिलाफ लड़ रहे थे। एक बार अराकान में लड़ते हुए। उनका एक साथी सिपाही गोलीबारी में जख्मी हो जाता है। जंग के दौरान वह अपने सिपाही साथी सिपाही को कंधे में उठाकर सही सलामत पहुंचाते हैं। उन्हें इस साहसिक कार्य के लिए ‘ मेंशन इन। डिस्पैच’ के पुरस्कार नवाजा गया।

बडगाम की लड़ाई: नवंबर 1947


बडगाम की लड़ाई: नवंबर 1947:-

3 नवंबर 1947। चना और उनकी कंपनी को बड़गांव पहुंचने का आदेश मिला। एक हॉकी मैच के दौरान उन्हें चोट लगी थी जिसके कारण उनके दाहिने हाथ में प्लास्टर लग गया था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी कंपनी के साथ गांव जाने का आग्रह किया। बड़गांव एक संवेदनशील क्षेत्र था। क्योंकि बड़गांव उन चुनिंदा रास्तों में से एक था जो श्रीनगर की ओर जाता था। और इसी के रास्ते पाकिस्तानी रेंजर श्रीनगर की ओर जाने वाले थे।

 इसी बात को ध्यान में रखते हुए अपनी दो  सशस्त्र कंपनियों को बडगाम की ओर भेजने का फैसला किया। जिसमें पहली कंपनी थी कंपनी A जो कि 4 कुमाऊं के अंदर आती थी। जिसका मोर्चा मेजर सोमनाथ ने संभाला था एवं कंपनी D जो कि 1 पैरा कुमाऊं के अंदर आती थी। जिसको कैप्टन रोनाल्ड व्हाट नेतृत्व कर रहे थे। और यह दोनों ही कंपनियां ब्रिगेडियर एल. पी सेन के नेतृत्व में थी।

500 पाकिस्तानी रेडर्स का जत्था गुलमर्ग के रास्ते बडगाम पहुंच गए। । और कंपनी को तीनों तरफ से घेर लिया। ओमनाथ शर्मा की कंपनी भारी गोला बारूद के बीच फस गई और उनकी कंपनी को भारी जानमाल का नुकसान हुआ। 

मेजर सोमनाथ शर्मा की टुकड़ी दुश्मन के मुकाबले संख्या में बहुत कम थी। परंतु मेजर सोमनाथ शर्मा यह जानते थे कि उनके यह उनकी यह जगह बहुत ही संवेदनशील है। क्योंकि अगर वह अपनी जगह हारते हैं तो दुश्मन के लिए श्रीनगर का और वहां के हवाई अड्डे का रास्ता खुल जाएगा।

इस मुश्किल घड़ी में मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपनी कंपनी को बहादुरी और दिलेरी से लड़ने का हौसला दीया। अपनी कंपनी से लाइट मशीनगन से फायर करते रहने का आदेश दिया। हर एक इंसान के पास मैगज़ीन खोद दौड़ दौड़ के पहुंचा रहे थे ताकि बंदूक से गोली चलती रहे और दुश्मन को लगे कि वह संख्या में बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। परंतु मैगज़ीन पहुंचाते पहुंचाते एक मोटर जहां गोला बारूद रखा था वह आकर फटा जिससे सोमनाथ शर्मा जी  शहीद हो गए।

ब्रिगेडियर को पहुंचाए अपने आखरी संदेश में उन्होंने जो कहा था वह सबके लिए आज भी प्रेरणा का काम करता है। उन्होंने कहा था “दुश्मन हम से सिर्फ 50 गज की दूरी पर है। के मुकाबले संख्या में बहुत कम है। भारी गोला बारूद के बीच फंस गए हैं। हम 1 इंची पीछे नहीं हटेंगे जब तक हमारे पास आखरी जवान और आखरी बंदूक है।”

जब तक कि राहत टुकड़ी वहां पहुंचती हम वह जगह हार चुके थे। पाकिस्तानी रैडेट्जकी 200 से भी ज्यादा  लोग मारे जा चुके थे, जिससे रीडर्स की आगे बढ़ने की गति धीमी हो चुकी थी। इसका फायदा भारतीय जवानों को श्रीनगर पहुंचने में मिला और श्रीनगर तक पहुंचने वाले सारे रास्तों को बंद कर दिया गया। कि मेजर सोमनाथ शर्मा और उनकी कंपनी का योगदान श्रीनगर और कश्मीर को बचाने में सबसे अधिक था।

इस जंग के समय मेजर सोमनाथ शर्मा की उम्र महज 25 वर्ष थी। साहस और बलिदान को देखते हुए वह भारत के भारत सरकार ने उन्हें  प्रथम परमवीर चक्र सम्मानित सैनिक बनने का गौरव प्रदान किया।

मेजर सोमनाथ शर्मा ने जो साहस और बलिदान अपने देश के प्रति दिखाया है। आने वाली पीढ़ियों को साहस बलिदान और शौर्य की गाथा सुनाता रहेगा 

“ऐसे भारत के वीर सपूत को हमारा शत-शत नमन।”
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