Lachit Borphukan : The Hero of Saraighat Battle 1671.

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Lachit Borphukan

Lachit Borphukan एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही असम का कण-कण जोश और गर्व से झूम उठता है। यह हमारे भारत देश की बदकिस्मती ही कहेंगे की ऐसे महान और कुशल नेतृत्व करता को असम से बाहर बहुत काम लोग ही जानते है।

Lachit Borphokan को एक ऐसे महान योद्धा के रूप में याद किया जाता है। जिसने अपने कुशल और निडर नेतृत्व की बदौलत मुग़ल साम्राज्य को भी अपने सामने घुटने टेकने में मज़बूर कर दिया था। 

आइये जानते है इस महान योद्धा के बारे मे और उस ऐतिहासिक लड़ाई जिसके बाद Lachit Borphukan इतिहास में अमर हो गया।   

Lachit Borphukan जी का प्रारंभिक जीवन -:

Ahom Empire’s Symbol

Lachit Borphukan का जन्म 16वी शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ था।उनका असली नाम Lachit Deca था। उनके पिताजी का नाम Momai Tamuli Borbarua था।

 इनके पिता Ahom साम्राज्य की सेना में Commander-in-Cheif के पद में तैनात थे। इनकी माता का नाम Kunti Moran था। जिस वक़्त यह पैदा हुए तब उस साम्राज्य के राजा Pratap Singha थे।  

Lachit Borphukan को मानविकी, स्वदेशी शास्त्र और सैन्य कौशल में शिक्षित किया गया था . उन्हें सेना प्रमुख बनाने से पहले बहुत से प्रमुख पद संभालने का मौका मिला जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।उनके द्वारा सुशोभित पद कुछ इस प्रकार है – :

  • उन्हें ‘Soladhara Barua’ का पदभार सम्भाले का मौका मिला जिसका मतलब होता है साम्राज्य का झण्डा पकड़कर चलने वाला। यह पद ‘निजी सचिव’ के बराबर का पद होता है। 
  • उन्हें Ghora Barua का अधीक्षक बनाया गया। जिसका मतलब होता है ‘Cheif of Stable of Royal Horses’.
  • रणनीतिक सिमुलगढ़ किले के कमांडर
  • उन्हें रणनीतिक सिमुलगढ़ किले के कमांडर के रूप में नियुक्त किया गया।  
  • उन्हें Chakradhwaj Singha.की सेना में Dolakaxaria Barua(Royal Household Guard) के अधीक्षक का पदभार दिया गया . 

इन सब पदों को सुशोभित करने के बाद ‘Raja Chakradwaj Singha’ ने Lachit Borphukan को Ahom सेना की कमान संभालने और Guwahati को मुग़ल साम्राज्य के चंगुल से आज़ाद करने का कार्य सौपा।  Ahom साम्राज्य की परंपरा अनुसार उनको सोने की तलवार भी भेट की गई।  

असम राज्य इस्लामिक शासन से क़रीब 1662 के आस-पास बहुत खतरा महसूस करने लगा था।  जब मुग़लों ने Ahom साम्राज्य की राजधानी Gargaon में आक्रमण किया।  तब उस आक्रमण का नेतृत्व Mir Jumla कर रहा था।  

उस वक़्त के राजा Jayadev Singha ये जानते थे की मुग़लों की विशाल सेना का सामना सीधी लड़ाई तो, वह ऊंची टीलों जाकर Gorilla Warfare शुरू करदी।  यह लड़ाई बहुत दिनों तक चलती  रहीं जो मुग़ल सोचकर नहीं आये थे।  

इस लड़ाई  परिणाम नहीं निकला और मुग़लों और Ahom राज्य के  बीच समझौता तय किया गया। इस समझौते के तहत Ahom राज्य को अपनी जमीन का हिस्सा मुग़लों को सौपना पड़ा।  यह Ahom राजा के लिए बहुत ही बड़ा झटका था।  

इस समझौते से राजा जयदेव सिंघा बहुत आहात हुए और बीमार पड़ गए।  अपनी मृत्यु से पहले आपने राज्य के होने वाले राजा यानि Chakradwaj Singha से Ahom राज्य पर हुए हमले का बदला लेने का वडा किया।  उनकी मृत्यु वर्ष 1662 को हो गई।   

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सेना प्रमुख बनने के बाद की चुनौतियाँ -:

 Lachit जब Borphokan बने तब Ahom सेना को मज़बूत बनाने की चुनौती उनके सामने खड़ी थी। उनके सामने मुग़ल साम्राज्य जैसी बड़ी सेना को हारने का ज़िम्मा था। मुगलो से हारी हताश सेना में जोश भरना और अंदर जीत की आग जलाना था।  

उन्होंने सारा ध्यान आपने किलों को मजबूत करने में लगाया। उन्होंने हथियार बनाने में भी बहुत ध्यान दिया।  

उनको यह पता था की अगर उनकी सेना को मुग़लों को हराना है तो अपने किलों और हथियार को पूर्ण तरीक़े से सशक्त करना होगा। उन्हें पता था की एक दिन मुग़लों के साथ निर्णायक युद्ध के समय यह तैयारियाँ उनके काम आएँगी।  

Saraighat का वो युद्ध जिसने Lachit Borphukan को इतिहास में अमर कर दिया।  

Lachit Borphukan ने अपने कुशल नेतृत्व से november 1667 तक मुग़लों को असम के बचें हुए हिस्सों से भी बाहर निकाल दिया।इस हार से दिल्ली में बैठा मुग़ल बादशाह आलमगीर तिल मिला उठा और अपनी एक बहुत बड़ी सेना जिसका नेतृत्व राजा Ram Singh Kachwaha कर रहा था, उसको असम भेजा।  

 राजा Ram Singh Kachwaha के साथ लगभग 71000 मुग़ल सैनिकों की विशाल सेना थी।  

इस सेना में 4000 सैनिक, 1500  सम्राट की गृहस्थी घुड़सवार सेना , 500 शाही बंदूक धार, 30000 की पैदल सैनिक, 15000 तीरंदाज और बाकि 15000 अतिरिक्त  घुड़सवार और पैदल सैनिक।  

वहीं दूसरी ओर Lachit जी की सेना मुग़लों के सामने बहुत ही छोटी दिखाई दे रही थी।  

Saraighat का युद्ध  Feb 1671  में शुरू हुआ यह दोनों प्रतिद्वंद्वी सेनाओं के बीच कई छोटे-मोटे झगड़ों की परिणति थी। जबकि मुग़ल सेना राजा Ram Singh के नेतृत्व में Ahom राज्य से युद्ध वर्ष Feb 1669 से लड़ रही थीं.   

Lachit Borphukan ने सेना का नेतृत्व लड़ाई में सबसे आगे रहकर किया। उन्होंने मुघलो को लगभग लड़ाई के हर छेत्र में धूल चटाया था।  अपनी हार को सामने देखते हुए मुग़ल राजा औरंगज़ेब में राजनैतिक रास्ता लेने का मन बनाया उसने अपने सेना प्रमुख से Ahom राज्य के साथ संधि कर लेने का प्रस्ताव भेजा। परन्तु मुग़ल शासक ये भूल गया की यह अब बदला हुआ और मजबूत Ahom राज्य है . 

Lachit Borphukan ने  आपने साथी Liutenent की बात मानते हुए मुग़लों से समझौते के सरे प्रस्तावों को सिरे से नकार दिया। Lachit और उनके सैनिकों का मानना था की समझौता मुग़लों का सिर्फ़ एक छल और दिखावा है. 

आख़िर Saraighat की लड़ाई का भी दिन आया , परन्तु उस दिन Lachit इतने बीमार थे की बिस्तर से उठ भी नै सकते थे।  परन्तु प्रणाम है उस महान योद्धा को जिसने अपनी धरती  रक्षा करने के लिए आपने वैध और आपने प्राणो की  बगैर सीधे मैदान  लोहा लिया।  

यह युद्ध  पूर्णतः पानी में लड़ा गया था।इस युद्ध में Lachit और उनकी सेना आंधी की तरह मुग़ल सेना पर टूट पडी।  सेना अध्यक्ष बनने के बाद की गई सारी तैयारी और अपने युद्ध कौशल को Ahom साम्राज्य ने इस एक युद्ध में लगा दिया।  लाचित Borphukan द्वारा किये गए नेतृत्व ने आग में घी का काम किया।  

Ahom सेना ने मुग़लों को बुरी तरह हरा दिया।  

इस युद्ध को जीतकर और Ahom साम्राज्य के वैभव को वापिस हासिल कर, Lachit Borphukan की बीमारी के कारण लगभग एक साल बाद मृत्यु हो गई।    

ऐसे महान योद्धा,नेतृत्वकर्ता और अपनी मातृभूमि में सर्वस्व निछावर  योद्धा को हमारा प्रणाम।  

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